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हे साहित्य! तुम्हे आत्मसात् करती हूँ,,

Posted On: 24 Nov, 2017 में

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आसान नही होता
सांसारिकता में बंध
तुम्हे रचना,,
फिर भी मै प्रयास
करती हूँ,,
हे साहित्य!
मै तुम्हे आत्मसात
करती हूँ,,,,

मिले हो ईशाषीश से
तुम्हे प्रीत का मुधरतम्
गीत मान
मै तुम्हे काव्यसात्
करती हूँ,,
हे साहित्य!
मै तुम्हे आत्मसात
करती हूँ,,

हाँ प्रेमासक्त हुई तुम
संग,मै प्रेम शंख का
निनाद् करती हूँ
मै तुम्हे विख्यात्
करती हूँ,,
हे साहित्य!
मै तुम्हे आत्मसात
करती हूँ,,

लिली



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashi bhushan के द्वारा
December 7, 2017

आदरणीय लिली जी, सादर ! शीर्षक की भावनाओं के साथ न्याय करती रचना ! शब्दों का प्रयोग भी सटीक और संतुलित !

lily25 के द्वारा
December 15, 2017

sabhar dhanyawad aapka..!!


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