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अपराजिता की अभिलाषा,,,

Posted On: 12 Nov, 2017 में

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मै आत्माओं का संभोग चाहती हूँ
वासनाओं के जंगलों को काट
दैविक दूब के नरम बिछौने
सजाना चाहती हूँ,,,

करवाऊँ श्रृगांर स्वयं का तुमसे
हर अंग को पुष्प सम सुरभित
खिलाना चाहती हूँ,,,,,

अधरों की पंखुड़ियों पर सिहरती
तुम्हारी मदमाती अंगुलियों की
चहलकदमी चाहती हूँ,,

भोर की लाली लिए अंशुमाली से
नयनों को तुम्हारी नयन झील
में डूबोना चाहती हूँ,,,,,

तन की अपराजिता बेल को सिहराते
तुम्हारे उच्छावासों की बयार से अपनी
हर पात को हिलाना चाहती हूँ,,,

खिल उठेगा भगपुष्प भुजंगीपाश से
प्रीत का रस छोड़ देंगी पुष्प शिराएं
यह रसपान तुम्हे कराना चाहती हूँ,

चहचहा उठेगीं खगविहग सी उत्कर्ष
की अनुभूतियां,मै आनंदोत्कर्ष का
यह पर्व मनाना चाहती हूँ,,,,

भौतिकता का भंवर अब नही सुहाता
संतुष्टि की जलधि में ज्वारभाटा बन
अपने चांद को छूना चाहती हूँ,,,

मै तुम संग आत्मिक संभोग चाहती हूँ



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
November 12, 2017

कुछ शब्दों के अवांछित प्रयोग से बचकर भी कविता का सृजन हो सकता था आदरणीया… बस इतना ही कहना चाहता हूँ.

lily25 के द्वारा
November 13, 2017

गहनतम्अनुभूतियों में केवशीभूत हो जब रचना बहती है…..आदरणीय तब शब्द स्वतः रच जाते हैं…..मेरे लिए कविता का हर शब्द पवित्र है…..सब शिवमय है …… साभार लिली


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