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सफर में हमसफर की तलाश

Posted On: 22 Jul, 2017 Others में

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‘नवोदित यौवन’ उम्र का एक अद्भुत एहसास, एक छोटे मेमने सा, जो कौतूहलवश इधर-उधर बौराया सा कूलाचें भरता रहता है। मन मे उठती हैं कितनी तंरगें, हर तरफ एक तलाश लिए। कुछ ऐसी ही मेमने सी कौतूहली कूलाचें उठती थीं साक्षी के मन में।

journey

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीए प्रथम वर्ष में प्रवेश पाया। पिता रेलवे कर्मचारी मिर्ज़ापुर के पास चुनार रेलवे स्टेशन पर, स्टेशन अधीक्षक के पद पर कार्यरत। अतः पढ़ाई के लिए साक्षी को हॉस्टल में रहना पड़ा। परिवार से अलग, नए दोस्त, नया परिवेश, एक अद्भुत स्वतंत्र वातावरण की अनुभूति साक्षी को आनंदित कर रही थी। छुट्टियों में वह प्रयाग स्टेशन से चलने वाली पैसेन्जर ट्रेन से अक्सर घर अकेले ही आ जाया करती थी। अकेले ट्रेन यात्रा करना उसके लिए बड़ा रोमांचकारी होता था, जिसको वह पूरी शिद्दत से जीती थी। कुछ हल्के-फुल्के गुदगुदाते किस्से हो जाया करते थे। किसी चेहरे पर नज़र टिक जाती थी या किसी की नज़र उसके चहरे पर ठहर जाती थी। गंतव्य स्टेशन के आते ही सारी मस्तियां, यादें बन आंखों में बस जाती थीं।
साक्षी इन किस्सों को बड़े उत्साह और व्यग्रता के साथ मन में संजोकर रखती थी। हॉस्‍टल लौटकर जब तक अपनी सखियों से इसकी चर्चा करके चटपटे-चुटीले ठहाके लगा न लेती, तब तक उसकी वह रोमांचक यात्रा समाप्त नहीं होती थी। साक्षी का सुनाया एक ऐसा ही किस्सा पता नहीं कैसे जेहन मे तरंगित हो उठा सोचा लिख लूं…

शायद दशहरे की छुट्टियां हुई थी। ठीक से याद नहीं पर वह अपना बैग रात में पैककर सुबह सात बजे ही प्रयाग स्टेशन के लिए निकल पड़ी। महिला-छात्रावास से काफी करीब था, इसलिए पैदल जाया जा सकता था। वह अक्सर पैदल ही जाती थी। साथ में उसकी रूम मेट रोमा भी जाती थी। पैदल जाने का एक विशेष और नटखटी कारण होता था। सुबह-सुबह आसपास के पुरुष छात्रावास के लड़के ‘लल्लाचुंगी’ पर चाय पीने आते थे। चाय की चुस्कियों के साथ ‘नयनसुख’ दोनों तरफ से भरपूर उठाया जाता था।
शरारती खुसुर-फुसुर दोनों तरफ हुआ करती थी। ऐसा भी होता था कि कभी-कभी कोई मनचली टोली स्टेशन तक पीछे-पीछे चली चलती और ट्रेन तक बिठा आती। संवाद आपस में ही होते थे पर इतना मद्धम कि आगे चल रही बालाओं के कान तक पहुंच जाए। यदि युवतियों की खनकती हंसीं, दबी सी आवाज़ में निकल गई, तो टोली की सुबह बन जाती थी। तो बस इसी तरह थोड़ी दूर की यह चुलबुली यात्रा एक खलबली, एक रोमांच के साथ समाप्त हो जाती।

खैर, साक्षी की ट्रेन आ गई। वह रोमा को बाय बोलकर बैठ गई। ट्रेन में बैठते ही एक सरसरी निगाह से टटोल लिया कि शायद कोई हमसफर मिल जाए, इस दो-ढाई घंटे के सफर में, तो एक नया किस्सा मिल जाएगा, अपनी सखियों संग चटखारे मार सुनाने को।
चेहरे पर एक मासूमियत थी साक्षी के, जो बरबस ही किसी को भी आकर्षित करने की क्षमता रखती थी। अपनी ही धुन में मस्त साक्षी को एक आभास हुआ कि उसकी सीट के सामने ही एक नवयुवक बड़ी देर से उसे निहारे जा रहा है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य ही है शायद कि जब कोई आपको ही देखता है एकटक निगाहों से, तो मन भांप ही लेता है।

नवयुवक की उस अपलक निहार से साक्षी थोड़ी असहज सी हो गई। उसने अपने बैग से मैग्ज़ीन निकाली और बड़ी गम्भीर मुद्रा बनाकर पन्नों को इधर-उधर पलटने लगी। इन भावों का प्रदर्शन मात्र एक दिखावा ही था। असल में मन में एक झनक सी उठ चुकी थी। चेहरे को किताब की आड़ में छुपाकर यह देखने का प्रयास कि वह युवक उसे देख रहा है या नही। महाशय की नज़र तो मानों गीली मिट्टी में अन्दर तक खूंटे के भांति धंस गई थी। अब वे हल्की मदमाती मुस्कान भी देने लगे थे।

नयनों का टकराना, लजाना और झुक जाने तक का सफर तय कर लिया था, इस सफर ने। साक्षी भी अभिभूत हो रही थी, इन क्षणों की उल्लासी कोमलता से। पता नहीं कैसे और कब समय बीतता गया। अचानक वह अपनी सीट से उठकर साक्षी की तरफ बढ़ा। उसके हर कदम के साथ साक्षी के दिल की धड़कन तेज़ होने लगी। उसको लगा, कहीं कलेजा बाहर ही न निकल आए। वह बड़ी शालीनता से साक्षी के सामने रुका। मुस्कुराती आंखों से उसकी ओर देखते हुए बोला- क्या मैं आपकी यह मैग्ज़ीन ले सकता हूं? साक्षी का कलेजा गले पर आकर जैसे अटक चुका था। घबराहट से जैसे हाथ-पांव ठंडे हो गए थे।
उसके मुंह से निकला- जी, ज़रूर, इतना कहकर मैग्ज़ीन उस युवक की तरफ बढ़ा दी। एक मनभावनी मुस्कान के साथ वह किताब लेकर वापस अपनी सीट पर बैठ गया। साक्षी ने एक गहरी सांस छोड़कर थोड़ा सामान्य होने के लिए ट्रेन की खिड़की से बाहर देखना शुरू कर दिया। जैसे किसी तूफान से बाहर आई हो। पर मन गुहार लगाने लगा… देखले जी भर के, इस सफर के हमसफर को, अभी तो मंज़िल आ जाएगी, फिर तू कहां और वो कहां? साक्षी ने तुरन्त गर्दन उसकी तरफ मोड़ ली। वह कुछ लिख रहा था किताब पर। कुछ अटकलें, कुछ कौतूहल फिर से कूदने लगा… “क्या लिख रहा होगा?”
थोड़ी ही देर में वह अपना सामान उठाकर साक्षी की तरफ बढ़ने लगा, शायद उसका स्टेशन आने वाला था। किताब साक्षी को पकड़ाई और एक अविस्मरणीय मुस्कुराहट के साथ बड़े विनम्र शब्दों में धन्यवाद बोलकर वह गेट की तरफ चल पड़ा। ट्रेन रुकी मिर्ज़ापुर स्टेशन पर और वह उतर गया। साक्षी ने सबसे पहले मैग्ज़ीन का वह पन्ना खोजा, जहां वह कुछ लिख गया था। एक पृष्ठ खुला, जिस पर बड़ी सुन्दर लिखावट के साथ एक फोन नम्बर (जो अब याद नहीं आ रहा) लिखा था। साथ ही लिखा था ‘आपके चेहरे की मासूमियत और मुस्कुराहट दोनों बहुत मुलायम हैं, इसे यूं ही सजाए रखिएगा। कभी मन करे, तो फोन ज़रूर कीजिएगा’ –समरेन्द्र।

कई बार इन मोतियों जड़ित भावों को पढ़ती रही साक्षी। मन ही मन आनंदित होती रही पर उसने अपने भीतर की गुदगुदाहट को चेहरे पर आने से रोके रखा। चुनार स्टेशन तक का सफर इन्हीं भावनाओं की लहरों मे बहते हुए कट गया। वह भी अपने घर चली गई। कई किस्सों में एक यह भी किस्सा जुड़ गया। सहेलियों को खूब चटखारे लेकर कुछ मनगढ़ंत संशोधनों के साथ यह किस्सा सुनाया गया।

कई वर्षों तक साक्षी ने उस मैग्‍जीन को सहेजकर रखा। अक्सर निकालकर एक मीठी मुस्कान के साथ वह संदेश पढ़ लेती थी। फोन नम्बर को भी बस देख लेती। शायद वह अजनबी फोन का इन्तज़ार करता रहा हो? अंत मे बस इतना ही… सफर में एक हमसफर की तलाश सभी को है, जो मिल गया तो अच्छा, जो नहीं मिला तो तलाश जारी है दोस्त।



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