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हे राधा !,,,कृष्ण पर क्रोध व्यर्थ

Posted On: 9 Jun, 2017 में

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राधा रूठ गई कन्हैया से,,कह डारी कितनी ही कड़वीं बतियां मनबसिया से। कहे राधा नयनन् मे भर के आंसुअन की धार, कहो कन्हैया का देखो तुम इन गोपियन मे,,अऊर हो जात हो निढाल? जिया मोर सुलग जाए सुन तुम्हरी रसिली बतियां,, ए कन्हैया! काहे तुम रस बरसाओ इन पर, मै कुढ़ कर नीम्बौरी बन जाऊँ,,सही ना जाए मोह से ऐसी बतियां,,,,,,, ऐसे संवाद राधा और कृष्ण मे अवश्य होते होंगें,,। कृष्ण के चितचोर नयन,,मोहक रूप ,उस पर बांसुरी से मन मोहनी तान छेड़ने का हुनर ने पूरे ब्रज की गोपियों को मोहपाश मे जकड़े हुए था।
जब कल्पना जगत के फ्लैशबैक मे जाकर राधा-कृष्ण की अमरप्रेम कहानी के किस्से सुनती हूँ तो राधा के प्रति आदर से भी बढ़कर यदि कोई भाव हो ,तो मन मे आता है। कैसे एक स्त्री होते हुए वह अपने प्रेमी कृष्ण को अन्य गोपियों के साथ छेड़-छाड़ को सह पाती थीं? राधा आप शायद इसीलिए पूज्ययनीय हो। कृष्ण पर क्रोध करती होंगीं कुछ पल के लिए फिर मुहँ फुलाकर दूर भी चली जाती होंगीं।पर मन मे कृष्ण के प्रति अनन्त अनुराग,,अथाह प्रीत उनको बहुत देर तक क्रोध की अगन मे जलने नही देती होगी। अन्तरमन से संवाद कर राधा फिर से मुस्कुरा उठती होंगीं,, यह सोचकर की असंख्य गोपियों के साथ छेड़-छाड़,थोड़ी चुहलबाज़ी करने के बाद भी कृष्ण के एकान्त भावनात्मक पलों की संगीनी सिर्फ राधा ही हैं।
अब कृष्ण भले ही भगवान हों परन्तु पृथ्वी पर मानव अवतार हैं, और ‘पुरूष’ हैं। पुरूष यानि संसार को चलाने वाला,,चट्टान सा सख़्त दिखने वाला,,अपने अहम् को अपना आभूषण मानने वाला,,अपने भुजबल से युद्धों पर विजय प्राप्त करने वाला। उसके शरीर के बाई तरफ भी एक धड़कता हुआ दिल होता है जिसमे रक्त का संचार सतत् प्रवाहशील इसलिए है ताकि वह जीवन की कठोरता को बिना टूटे सहन करता रहे। अपने कर्मक्षेत्र और अपने दायित्वों का निर्वाह कठोरता के साथ करता रहे। उसका ‘पुरूषत्व’ अंहकार से भरा होता है। वह लचीला नही होता। उस पर आघात् लगे तो वह तिलमिला उठता है। अपने पौरूष को बनाए रखने के लिए उसे नारी का साथ चहिए होता है। पुरूष भी भावुक होते हैं पर नारी की तरह अपनी भावनाओं का प्रदर्शन नही करते। हृदय की दुनिया को समेटे रखने के लिए सांसारिक कर्तव्यों को कुशलता से निभाते जाने के लिए उन्हे शक्ति एंव उर्जा की आवश्यकता पड़ती है। अब हंसी आ रही है मुझे लिखते हुए- कि नारियां पुरूष रूपी चूल्हे का ‘ईर्धन’ हैं,,,,जिसको जलाकर वे जीवन कर्तव्यों का भोजन पकाते हैं। एक ईर्धन समाप्त हुआ दूसरा डाला जाता है। दूसरा खत्म तीसरा,,,,,,,,,,,,पर एक लकड़ी बहुत मोटी वाली होती है जो अंत तक साथ देती है,शेष सहयोगिनियां होती हैं।
मै अब मन ही मन राधा से बोल पड़ी,,, हे राधा! कृष्ण पर क्रोध व्यर्थ था। उनको अपने चूल्हे को जलाए रखने के लिए16100 रानियों+8पटरानियों को पत्नियों स्वरूप, एक राधा जैसी प्रेमिका, और मीरा जैसी साधिका की आवश्यकता पड़ी(हो सकता है और भी नाम हों,पर प्रसिद्धि इन दोनो को ही मिली)। कृष्ण का कर्मक्षेत्र भी गौर तलब है,,, स्वम् ही गीता मे बोला है-
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः
अभयुत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यहम्।”
पूरी पृथ्वी को पाप से मुक्ति और धर्म संस्थापना उनका कर्म था। इतने बड़े जीवनअभियान के लिए कई हज़ार पत्नियां,प्रेमिका,साधिका का जीवन मे होना उनकी आवश्यकता थी,,,इसे विलासिता कहना अनुचित होगा। धर्म के विरूद्ध होगा।
यह कृष्ण का चारित्रिक दोष कतई नही था।
इसके विपरीत जब ‘रामावतार’ पर सोचने बैठती हूँ ,,तो पाती हूँ आजीवन एक स्त्रीव्रता बन कर बिचारे राम को क्या मिला,,,,? जीवनभर सीता के सानिध्य को तरसते रहे,,। एक पत्नी मिली उसको भी रावण हरण करके लेगया। युद्ध करके वापस लाए तो एक धोबी के कहने पर गर्भवती पत्नी को घर से बाहर भेजना पड़ा । अंत मे सीता मइयां ही धरती मे समा गईं। राम का जीवन विलाप बनकर ही रह गया। यही कारण है कि, आज भी कृष्ण की जीवन यापन शैली व्यवहारिक मानी जाती है,,जबकि राम की जीवन शैली एक ‘आदर्श’ मात्र है। मतलब कि- कृष्ण जैसी जीवन शैली अपनाई तो पूरा जीवन रसपूर्ण और जीवन के सभी कर्तव्य रचनात्मकता के साथ पूरे हो जाएगें। यदि राम जैसी जीवन शैली अपनाई तो भइय्या,,,, रोते रह जाओगे और आदर्श का प्रतीक बना दिए जाओगे।
मैने जो सोचा जो वैचारिक मंथन किया शायद यही मंथन राधा भी करती होंगी,,, जब वह कृष्ण के छलिया रूप से क्रुद्ध हो जाती रही होंगीं। इस निष्कर्ष पर आकर मुस्कुरा उठती होंगीं,,, कृष्ण पर क्रोध व्यर्थ,,कृष्ण का व्यवहार नियति निर्धारित। कृष्ण छलिया नही कृष्ण सच्चे पुरूष जिसे अपने विशाल जीवन लक्ष्य को पूरा करने के लिए ऊर्जा का एक विशाल भंडार चाहिए। इसके लिए उन्हे नारियों के विशाल सानिध्य की दरकार थी। हर एक की अलग विशिष्टता, अलग प्रकार की ऊर्जा देती है। परन्तु राधा,रूक्मणी,मीरा में विशिष्टताओं का बाहुल्य था इसलिए वह उनको अधिक प्रिय थीं। उनके साथ उनका नाम जुड़ गया।
इसलिए हे राधा तुम रूठियो मत,,यदि कृष्णयुग फिर से आए,,। जो कतई रूठ भी जइयो तो खुद ही मान जइयों ,, अपने संवरियां से लिपट जइयों और कहिओ,, कन्हैयां! मोरे संइय्या जग घूमया थारे जैसा ना कोई!!!!
क्यों रूठ रही राधे तू कन्हैया से
मुरलीधारी वह बनवारी
कर्मक्षेत्र को जुझारी,,,
बात मोरी मान
हिया से लिपट
हे राधा! कृष्ण पर क्रोध व्यर्थ



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