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विश्वरूप सा प्रेम तुम्हारा

Posted On: 16 Dec, 2016 में

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हे प्रियतम! विश्वरूप सा वृहद प्रेम तुम्हारा
मेरा सर्वस्य तुमसे ही उत्पन्न है,
तुममे ही विलीन हो जाएगा।

हे प्रियतम! दिव्य प्रकाशपुंज सा प्रेम तुम्हारा
मेरे अन्तर्मन का तम तुमसे ही ज्योर्तिमय है,
तुममे ही प्रकाशित हो जाएगा।

हे प्रियतम! महासागर सा धीर-गम्भीर प्रेम तुम्हारा
मेरी समस्त भावनाएँ तुमसे ही तरंगित हैं,
तुममे ही समाहित हो जाएगीं।

हे प्रियतम! हिमाद्रि श्रेणियों सा उच्च प्रेम तुम्हारा
मेरी समस्त आकांक्षाएँ तुमसे ही पराकाष्ठित हैं,
तुममे ही स्थिर हो जाएगीं।

हे प्रियतम! प्रचंड वायुवेग सा प्रवाहित प्रेम तुम्हारा
मेरा सर्व उल्लास तुमसे ही गतिमान है,
तुम्हारे आवेग मे ही बह जाएगा।

हे प्रियतम! दिव्य अलौकिक अनुभूति सा प्रेम तुम्हारा
मेरा अस्तित्व तुमसे ही दीप्तमान है
तुममे ही चिरनिद्रा मे लीन हो जाएगा।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhola nath Pal के द्वारा
December 17, 2016

उत्तम कृति बेटी !

lily25 के द्वारा
December 17, 2016

किसी रचना को जब पितृत्व का भाव मिलता है तो रचनाकार उस विधा में और लिखने की प्रेरणा प्राप्त करता है। अभिनव एवं उत्साही प्रेरणा के लिए आभार।


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