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अलमारी का 'वो कोना'

Posted On: 16 Oct, 2016 में

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दिल करता है तुमको अपनी अलमारी के किसी कोने मे
अच्छे से सहेज कर रख दूँ,और
मशगूल हो जाऊँ रोज़मर्रा की भाग दौड़ मे।

मशरूफियत इतनी हो कि अलमारी का ‘वो कोना’
दिल के किसी कोने मे दफ्न हो जाए,
कोई साज़ कोई आवाज़ वहाँ तक न पहुँच पाए।

मेरी सुबह बालों का जूड़ा बड़ी बेतरबी से बनाते हुए
किचन की तरफ दौड़ते हुए शुरू हो,और
रात जूड़े के क्लचर को तकिए के नीचे खोंसकर सो जाए।

इतवार की अलसाई सुबह,चाय का प्याला,मोबाइल मे
तुम्हारी पुरानी ‘चैट’ को पढ़ते हुए शुरू हो
फिर ‘सनडे स्पेशल ब्रेकफास्ट’ की तैयारी मे धूमिल पड़ जाए

कुछ साल बाद अस्त-व्यस्त अलमारी को करीने से लगाने बैठूँ
‘उसी कोने ‘मे मेरा हाथ चला जाए, मैं धीरे से तुम्हे निकालूँ
मुस्कुराते होंठों और सजल नयनों से जीभर देखूँ।

साड़ी के आंचल से तुम्हारे चेहरे को पोछू,ह्दय से लगाऊँ
भारी मन से वापस उसी कोने में सहेज कर रख दूँ।
आंखों के आसूँ गालों तक आकर सूख जाए

एक गहरी सांस के साथ फिर से मशगूल हो जाऊँ
अलमारी का ‘वो कोना’ दिल के किसी कोने में खोजाए
कोई साज़, कोई आवाज़ वहाँ तक ना पहुँच पाए।



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 17, 2016

रुला दिया आपने तो । क्या कहूँ इसे पढ़ने के बाद । एक बहुत पुराने गीत की दो पंक्तियाँ इसी संदर्भ में लिख रहा हूँ – ‘सूखे पत्तों का जला बरगद तले अलाव, लगे सुलगने आज फिर मन के गीले घाव’ ।


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